मानव के वेश में कितने रावण छुपे
इनकी पहचान कहाँ से लाओगे ?
त्रेता युग में था बस इक रावण
जिसे मारने इक राम ने अवतार लिया
कलयुग के छुपे रावनों को मारने
इतने राम कहाँ से लओगे ?
युग बदला, दुनिया बदली,बदल गया इंसान,
प्रेम सद्भावना,इंसानियत कमतर हुई
इंसान बना फिर से हैवान,
मासूमियत को कुचला जिसने ,
कितनी कलियों को मसला जिसने,
ऐसे "मोनिन्देरों " की पहचान कहाँ से लाओगे?
छीनता रहा अगर यूं ही बचपन ,
और सहमा सा होगा हर मन
घुटटी रही'मानवता यूं ही
कैसे उपजेगा विश्वास किसी पर
विरान हो जायेगी यह धरती
इस पर बसने के लिए इंसान कहाँ से लाओगे
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